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Jun 8, 2013

ज्योतिष ज्ञान

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स्मरणशक्ति बढ़ाने और बुध्दि तेज करने के उपाय

स्मरणशक्ति बढ़ाने और बुध्दि तेज करने के उपाय

1st-सरस्वती के विभिन्न

मंत्र से विद्या प्राप्ति

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (फरवरी-2011)
http://gurutvajyotish.blogspot.com/


ज्यादातर विद्यार्थियों कि स्मरण शक्ति कमजोर होती हैं। बच्चे को एवं उसके माता-पिता को एसा लगता हैं, कि बच्चे का मन पढाई में नहीं लगता, या बच्चे जितनी मेहनत करते हैं उन्हें उसके अनुरुप फल नहीं मिलता, परीक्षा के प्रश्न पत्र में लिखते समय उसे भय रहता हैं, बच्चे ने जो पढाई कि हैं वह परिक्षा पत्र में लिखते समय भूल जाता हैं, इत्यादी.., कारणो से बच्चे और माता-पिता हमेशा परेशान रहते हैं।

कुछ बच्चे होते हैं, जो एक या दो बार पढने पर याद कर लेते हैं, तो कुछ बच्चे वही पाठ्य सामग्री अधिक समय पढने के उपरांत भी कुछ याद नहीं रहता।

एसा क्यूं होता हैं? इस का मुख्य कारण हैं, अनुचित ढंग से कि गई पढाई या पढाई में एकाग्रता की कमी। विद्या अध्ययन में आने वाली रुकावटो एवं विघ्न बाधाओं को दूर करने हेतु शास्त्रो में कुछ विशिष्ठ मंत्रो का उल्लेख मिलता हैं। जिसके जप से पढाई में आने वाली रुकावटे दूर होती हैं एवं कमजोर याद शक्ति इत्यादी में लाभ प्राप्त होता हैं।

सरस्वती मंत्र:
या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वृस्तावता ।
या वीणा वर दण्ड मंडित करा या श्वेत पद्मसना ।।
या ब्रह्माच्युत्त शंकर: प्रभृतिर्भि देवै सदा वन्दिता ।
सा माम पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्या पहा ॥१॥

भावार्थ: जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह श्वेत वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर अपना आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती आप हमारी रक्षा करें।

सरस्वती मंत्र तन्त्रोक्तं देवी सूक्त से :
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

विद्या प्राप्ति के लिये सरस्वती मंत्र:
घंटाशूलहलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दघतीं धनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभाम्‌।
गौरीदेहसमुद्भवा त्रिनयनामांधारभूतां महापूर्वामत्र सरस्वती मनुमजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम्‌॥

भावार्थ: जो अपने हस्त कमल में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण को धारण करने वाली, गोरी देह से उत्पन्ना, त्रिनेत्रा, मेघास्थित चंद्रमा के समान कांति वाली, संसार की आधारभूता, शुंभादि दैत्य का नाश करने वाली महासरस्वती को हम नमस्कार करते हैं। माँ सरस्वती जो प्रधानतः जगत की उत्पत्ति और ज्ञान का संचार करती है।

अत्यंत सरल सरस्वती मंत्र प्रयोग:
प्रतिदिन सुबह स्नान इत्यादि से निवृत होने के बाद मंत्र जप आरंभ करें। अपने सामने मां सरस्वती का यंत्र या चित्र स्थापित करें । अब चित्र या यंत्र के ऊपर श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प व अक्षत (चावल) भेंट करें और धूप-दीप जलाकर देवी की पूजा करें और अपनी मनोकामना का मन में स्मरण करके स्फटिक की माला से किसी भी सरस्वती मंत्र की शांत मन से एक माला फेरें।

सरस्वती मूल मंत्र:
ॐ ऎं सरस्वत्यै ऎं नमः।

सरस्वती मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

सरस्वती गायत्री मंत्र:

१ - ॐ सरस्वत्यै विधमहे, ब्रह्मपुत्रयै धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात।
२ - ॐ वाग देव्यै विधमहे काम राज्या धीमहि । तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात।

ज्ञान वृद्धि हेतु गायत्री मंत्र :
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

परीक्षा भय निवारण हेतु:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम् भय निवारय निवारय अभयम् देहि देहि स्वाहा।

स्मरण शक्ति नियंत्रण हेतु:
ॐ ऐं स्मृत्यै नमः।

विघ्न निवारण हेतु:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवारय स्वाहा।

स्मरण शक्ति बढा के लिए :
ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।

परीक्षा में सफलता के लिए :
१ - ॐ नमः श्रीं श्रीं अहं वद वद वाग्वादिनी भगवती सरस्वत्यै नमः स्वाहा विद्यां देहि मम ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।
२ -जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी, कवि उर अजिर नचावहिं बानी।
मोरि सुधारिहिं सो सब भांती, जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥

हंसारुढा मां सरस्वती का ध्यान कर मानस-पूजा-पूर्वक निम्न मन्त्र का २१ बार जप करे-”

ॐ ऐं क्लीं सौः ह्रीं श्रीं ध्रीं वद वद वाग्-वादिनि सौः क्लीं ऐं श्रीसरस्वत्यै नमः।”

विद्या प्राप्ति एवं मातृभाव हेतु:
विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्तिः॥
अर्थातः- देवि! विश्वकि सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे हो।

उपरोक्त मंत्र का जप हरे हकीक या स्फटिक माला से प्रतिदिन सुबह १०८ बार करें, तदुपरांत एक माला जप निम्न मंत्र का करें।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महा सरस्वत्यै नमः।

देवी सरस्वती के अन्य प्रभावशाली मंत्र

एकाक्षरः
“ऐ”।

द्वियक्षर:
१ “आं लृं”,।
२ “ऐं लृं”।

त्र्यक्षरः
“ऐं रुं स्वों”।

चतुर्क्षर:
"ॐ ऎं नमः।"

नवाक्षरः
“ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः”।

दशाक्षरः
१ - “वद वद वाग्वादिन्यै स्वाहा”।
२ - “ह्रीं ॐ ह्सौः ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षरः
१ - “ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।
२ - “ऐं वाचस्पते अमृते प्लुवः प्लुः”
३ - “ऐं वाचस्पतेऽमृते प्लवः प्लवः”।

एकादशाक्षर-चिन्तामणि-सरस्वतीः
“ॐ ह्रीं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः"।

एकादशाक्षर-पारिजात-सरस्वतीः
१ - “ॐ ह्रीं ह्सौं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।
२ - “ॐ ऐं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

द्वादशाक्षरः
“ह्रीं वद वद वाग्-वादिनि स्वाहा ह्रीं”

अन्तरिक्ष-सरस्वतीः
“ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष-सरस्वती स्वाहा”।

षोडशाक्षरः
“ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा”।

अन्य मंत्र
• ॐ नमः पद्मासने शब्द रुपे ऎं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्दादिनि स्वाहा।
• “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा”।
• “ऐंह्रींश्रींक्लींसौं क्लींह्रींऐंब्लूंस्त्रीं नील-तारे सरस्वति द्रांह्रींक्लींब्लूंसःऐं ह्रींश्रींक्लीं सौं: सौं: ह्रीं स्वाहा”।
• “ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवती अर्हन्मुख-निवासिनि सरस्वति ममास्ये प्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐं नमः”।
• ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमयपिबंति सस्त्रोतः सरस्वती तु पंचद्या सो देशे भवत्सरित्।

उपरोक्त आवश्यक मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से विद्या की प्राप्ति होती है।


2ndमानव शरीर अनंत रहस्यों का भण्डार है। मनुष्य का मस्तिष्क ईश्वर द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण पूंजी और अंग है। यह सुपर कम्प्यूटर है, जो सारे शरीर की सूक्ष्म से सूक्ष्म नाड़ियों को व्यवस्थित रूप से संचालित करता है। इसकी कार्यशीलात पर ही सफलता और असफलता निर्भर करती है। साधारणतया मस्तिष्क का केवल 3 से 7 प्रतिशत भाग ही सक्रिय हो पाता है। शेष भाग सुप्त रहता है, जिसमें अनंत ज्ञान छिपा रहता है। ऐसी विलक्षण शक्ति को जाग्रत करने के कुछ उपाय यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
1. दोनों कानों के नीचे के भाग को अंगूठे और अंगुलियों से दबाकर नीचे की ओर खीचें। पूरे कान को ऊपर से नीचे करते हुए मरोड़ें। सुबह 4-5 मिनट और दिन में जब भी समय मिले, कान के नीचे के भाग को खींचे।
2. सिर व गर्दन के पीछे बीच में मेडुला नाड़ी होती है। इस पर अंगुली से 3-4 मिनट मालिश करें। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।
3. ज्ञान मुद्रा- प्रात: उठकर पद्यासन या सुखापन में बैठकर हाथों की तर्जनी अंगुली के अग्र भाग को अंगूठे से मिलाकर रखने से ज्ञान मुद्रा बनती है। शेष अंगुलियां सहज रूप से सीधी रखें, आंखें बंद, कमर व रीढ़ सीधी, यह अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्रा है। इसका हितकारी प्रभाव समस्त वायुमंडल और मस्तिष्क पर पड़ता है। ज्ञानमुद्रा पूरे स्ायुमंडल को सशक्त बनाती है। विशेषकर मानसिक तनाव से होने वाले दुष्प्रभावों को दूर कर मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को सबल बनाती है।
ज्ञानमुद्रा के निरंतर अभ्यास से मस्तिष्क की सभी विकृतियां और रोग दूर होते हैं। जैसे पागलपन, उन्माद, विक्षिप्तता, चिड़चिड़ापन, अस्थिरता, अनिश्चितता क्रोध, आलस्य घबराहट, अनमनापन, व्याकुलता, भय आदि। मन शांत हो जाता है। और चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। ज्ञानमुद्रा विद्यार्थियों के लिए वरदान है। इसके अभ्यास से स्मरण शक्ति और बुध्दि तेज होती है।
4. अकारण अंगुलियों को चटकाना, पंजा लड़ाना और अंगुलियों को अनुचित रूप से चलाना आदि आदतें मस्तिष्क और स्ायुमंडल पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इससे प्राणशक्ति का ह्रास होता है और स्मरण शक्ति कमजोर होती हैं। अत: इनसे बचना चाहिए।
5. आज्ञाचक्र ललाट पर दोनों भौंहों के मध्य स्थित होता है। इसका संबंध ब्रह्म शरीर से होता है। जिस व्यक्ति का आज्ञाचक्र जाग जाता है, वही विशुध्द ब्रह्मचारी हो सकता है। और उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। आज्ञाचक्र पर ध्यान केन्द्रित करने से आज्ञाचक्र जाग्रत होता है। सफेद रंग की ऊर्जा यहां से निकलती है। अत: सफेद रंग के ध्यान से आज्ञाचक्र के जागरण में सहायता मिलती है।
6. देशी गाय के शुध्द घी में एक बादाम कुचलकर डाल दें और उसे गरम करके ठंडा कर लें। तत्पश्चात् छानकर रखें। रात को सोते समय यह घी दो-दो बूंद दोनों नासिका के छिद्रों में थोड़ गुनगुना करके डालें। घी ड्रोपर में रख लें, डालने से पहले ड्रोपर की शीशी गरम पानी में रखें और फिर गरज होने पर नाक में डालें। यही घी नाभि पर डालकर 4-5 बार घड़ी की दिशा में और 4-5 बार घड़ी की विपरीत दिशा में घुमाएं, फिर उस पर गीले कपड़े की पट्टी और फिर सूखे कपड़े की पट्टी रखें। ऐसा करीब 10-15 मिनट करें। दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोएं। सोते वक्त दोनों पैरों की पदतलियों में अपने हाथ से घी से मालिश करें। इससे नींद अच्छी आती है, मस्तिष्क में शांति, प्रसन्नता और सक्रियता आती है। मनोबल बढ़ता है।
7. चार-पांच बादाम की गिरी पीसकर गाय के दूध और मिश्री में मिलाकर पीने से मानसिक शक्ति बढ़ती है। आयुर्वेद के अनुसार ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वच, असगंध, जटामांसी, तुलसी समान मात्रा में लेकर चूर्ण का प्रयोग नित्य प्रतिदिन दूध के साथ करने पर मानसिक शक्ति, स्मरण शक्ति में वृध्दि होती है।
8. उत्तर दिशा में मुंह करके पिरामिड की आकृति की टोपी पहनकर पढ़ाई करने से पढ़ा हुआ बहुत शीघ्र याद होता है। टोपी, कागज, गत्ता या मोटे कपड़े की बनाई जा सकती है।
9. देशी गाय का शुध्द घी, दूध, दही, गोमूत्र, गोबर का रस समान मात्रा में लेकर गरम करें। घी शेष रहने पर उतार कर ठंडा करके छानकर रख लें। यह घी ‘पंचगव्य घृत’ कहलाता है।
रात को सोते समय और प्रात: देशी गाय के दूध में 2-2 चम्मच पिघला हुआ पंचगव्य घृत, मिश्री, केशर, इलायची, हल्दी, जायफल, मिलाकर पिएं। इससे बल, बुध्दि, साहस, पराक्रम, उमंग और उत्साह बढ़ता है। हर काम को पूरी शक्ति से करने का मन होता है और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।
10. पढ़ाई में सफलता प्राप्त करने हेतु मन लगाकर पढ़ना, रुचिपूर्वक पढ़ना अत्यंत आवश्यक है। असफलता का अर्थ है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया।
11. रात्रि को सोते समय अपने दिन भर के किए हुए कार्यों पर चिंतन-मनन करना, उनकी समीक्षा करना, गलतियों के प्रति खेद व्यक्त करना और उन्हें पुन: न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए। प्रात: सो कर जागते समय ईश्वर को नया जन्म देने हेतु धन्यवाद देना चाहिए और पूरा दिन अच्छे कार्यों में व्यतीत करने का संकल्प लेकर पूरे दिन की योजना बनाकर बिस्तर छोड़ना चाहिए।
3rd-परीक्षाओं का दौर चल रहा है। सभी विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं। परीक्षा में पास होने के लिए विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई-लिखाई बहुत जरुरी है। कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं जो मेहनत तो काफी करते हैं लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं रहता और उनका परीक्षा परिणाम बिगड़ जाता है। ऐसे विद्यार्थी यदि नीचे लिखे सरस्वती मंत्र का प्रतिदिन जप करें तो उनकी बौद्धिक क्षमता का विकास होता है तथा वे कभी कुछ भुलते भी नही हैं। इस मंत्र का जप कोई भी विद्यार्थी कर सकता है। इस मंत्र के प्रभाव से विद्यार्थियों की स्मरण क्षमता बढ़ती है।

मंत्र

ऊँ ह्रीं श्रीं अहं वद वद वाग्वादिनी भगवती सरस्वती ऐं नम: स्वाहा विद्यां देहि मम ह्रीं सरस्वती स्वाहा।



जप विधि

- सुबह जल्दी उठकर नहाकर साफ वस्त्र पहनकर देवी सरस्वती का पूजन करें। उन्हें सफेद पुष्प अर्पित करें।

- देवी सरस्वती की मूर्ति के सामने आसन लगाकर स्फटिक की माला लेकर इस मंत्र का जप करें। प्रतिदिन पांच माला जप करने से उत्तम फल मिलता है।

- आसन कुश का हो तो अच्छा रहता है।

- एक ही समय, आसन व माला हो तो यह मंत्र जल्दी ही सिद्ध हो जाता है।



विद्यार्थी इस बात का विशेष ध्यान रखें कि इस मंत्र से सिर्फ स्मरण शक्ति बढ़ती है, परीक्षा में सफल होने के लिए मन लगाकर पढ़ाई करना बहुत आवश्यक है।





Jun 7, 2013

धर्म ----कर्म -और -मोक्ष - स्वामी विवेकानंद

*******धर्म ----कर्म -और -मोक्ष - स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार **** 6 स्वामी जी अजमेर में थे, धर्मचर्चा चल रही थी -किसी ज्ञानार्थी ने स्वामी जी से कहा " हमने श्र्स्टी का चरम सत्य पाया। फिर भी आज हम ,इतने पतित क्यों हैं ? हम ये दुर्दिन क्यों देख रहे हैं ?" "धर्म के लोप के कारण।" स्वामीजी के स्वर में पीड़ा का चीत्कार था, "धर्म का लोप होने से भारत की अवनति हुई। अवनति ही नहीं, यह दुर्गति हुई " उत्तर में प्रश्न के रूप में जिज्ञासा आणि थी और वो आई -" धर्म तो हमारे यहाँ अब भी है और किसी भी देश से अधिक है " ."धर्म नहीं, धर्म की भ्रान्ति है। धर्म बहुत कम है ,जाति के आधार वाला, सम्प्रदाय के आधार वाला ,धर्म ज्यादा है-पाखण्ड का बोलबाला है "' स्वामी जी आगे बोले " धर्म को जीना किसी ने सिखा ही नहीं, और मोक्ष प्राप्ति में लग गए, मोक्ष प्राप्ति की कामना ही हमारी, दुर्गति का कारण है " गोष्ठी में एक अकुलाहट भरी शान्ति सी छा गई। सब स्वामी जी की और प्रश्न की निगाहों से देखने लगे ? स्वामी जी बोले " भोग ना होने से त्याग नहीं होता। पहले भोग करो,फिर त्याग होगा।" स्वामी बोले, हुआ क्या ? लोग सन्यासी या त्यागी तो हो नहीं पाए, अग्रहस्थ हो गए। कर्म -जो उनका धर्म था -से विमुख हो गए। सारे के सारे लोग, कपड़ो से तो सन्यासी हो गये ; किन्तु उनका मन सन्यस्त नहीं हो सका।"......"उसके लिए अपेक्षित तपस्या -कर्म तपस्या -तो किसी ने की नहीं थी। वे न इधर के रहे और ना उधर के।" ...."ना ही उन्हें मोक्ष मिला और ना ही वो धर्म के अनुसार जी पाए, अपने आपको पाखंड की गोद में डालकर, धर्म के ठेकदार बन गए। धार्मिक न बनकर, धर्म के तस्कर बन गए " " हिन्दू शास्त्र कहते हैं - तुम गृहस्थ हो, तुम्हारे लिए वे सब बाते जरुरी नहीं हैं, जो किसी मोक्ष को पाने वाले के लिए जरुरी हैं। तुम अपने धर्म का आचरण करो" .... स्वामी जी लग रहा था जैसे की अपने आप से ही बाते करने लगे थे, "पहले मोक्षार्थी होने की योग्यता प्राप्त करो। अपने मोह के कारन एक हाथ तो लांघ नहीं सकते और लंका लांघ जाना चाहते हो? क्या यह उचित है ?" "दो आदमियों का पेट भर नहीं सकते, दो लोगो के साथ सहमत होकर, अपने स्वार्थ का दमन कर, प्रभु की श्र्स्टी के लिए कोई कल्याणकारी काम नहीं कर सकते हो, पर मोक्ष लेने दौड़ पड़े हो। मोक्ष पाने की प्रथम सीढ़ी ही भूल गए।".... "सबसे पहले हमें मानव ही बनना होगा और धर्म के अनुसार कर्म को अपने आचरण में लाना होगा। समाज के कमजोर वर्ग को गले से लगाना होगा। अपनी -अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाज का कल्याण करना होगा " स्वामी जी ने आगे कहा , "गृहस्थों को बड़े उतशाह के साथ अर्थोपार्जन कर स्त्री और परिवार के दस प्राणियों का पालन करना होगा।दस कल्याणकारी कार्य करने होंगे। समाज के हित में त्याग करना होगा।".... "एषा ना कर सकने पर तुम मनुष्य किस बात के ? जब तुम आदर्श गृहस्थ ही नहीं प्रमाणित हो सके तो फिर मोक्ष की चर्चा ही व्यर्थ है। धर्म- कार्यमूलक है। धार्मिक व्यक्ति का लक्ष्ण है -सदा कर्मशीलता" "हिन्दू धर्म कहता हैं कि धर्म की अपेक्षा, मोक्ष बहुत बड़ा है, सही ह, किन्तु धर्म के बिना मोक्ष नहीं मिल सकता है। सबसे पहले धर्म करना होगा यानी कर्म करना होगा उसको निभाना होगा।समाज के कल्याण के लिए कुछ करना ही होगा। धर्म अर्थार्थ सत्कर्म किये बिना -मोक्ष संभव ही नहीं है :" "तो क्या भक्ति से संसार में सब कुछ ठीक नहीं हो सकता है" -किसी ने जिज्ञासा की *ॐ नाम का जप करना- इस से सब कार्यों की सीधी होती है। सब पापों का नाश होता है" शास्त्रों की ये सारी अच्छी बाते, सच्ची अवश्य हैं, किन्तु देखा जाता है कि लाखो मनुष्य ॐ कार का जप करते हैं, हरिनाम लेने में पागल हो जाते हैं, रात दिन 'प्रभु जो करे ',कहते रहते हैं ; पर उन्हें मिलता क्या है ? स्वामीजी जी रूककर लोगो की और गहन द्रस्ठी से देखा और

गंभीर स्वर में बोले -" तब खोज करनी होगी की किसका जप यथार्थ है ? किसके मुख में हरिनाम वज्रवत अमोघ है। कौन सचमुच भगवान् की शरण में जा सकता है ? ....और इन सारे प्रश्नों का उत्तर है : वही, जिसने कर्म द्वारा अपनी चित शुधि का ली है, अर्थार्थ जो धार्मिक है और धार्मिक वाही है जो कर्म करता है और अपने कर्मो से अपना एवं समाज का कल्याण करता है "ॐ हरि ॐ : अरुण गर्ग ..... साभार पूत अनोखो जायो .

Jun 6, 2013

बाबासीर का ईलाज


बाबासीर का ईलाज

प्रकाश के प्रतीक का बुझना मृत्यु का प्रतीक होता है जन्म का नहीं

जन्मदिन ..........
हमारे भारत में आज हर कहीं पश्चिम के
अन्धानुकरण के कारण 'जन्मदिन' के दिन केक के
ऊपर जलती हुई मोमबत्तियों को बुझाकर फिर
खुश होने की परंपरा चल पड़ी है-
हमारी भारतीय संस्कृति में हमें इस तरह
जन्मदिन
मनाना शोभा नहीं देता क्योंकि हमारी संस्कृति
हम दिया तब बुझाते है जब घर में
किसी की मौत हो जाती है, भारत में आज
भी कई संस्कारी और परंपरागत घरों में यह
किया जाता है, ज़रा सोचिये कि हम अपने
ही जन्मदिन के दिन अपने ही हाथों से
जलती हुई मोमबत्तियों जो कि दीपक
का ही एक प्रतीक है, उसे बुझा रहे है, यह हम
सब जानते हे कि जलते हुए दीपक या और
किसी अन्य प्रकाश के प्रतीक का बुझना मृत्यु
का प्रतीक होता है जन्म का नहीं,......
यानि हम अपने जन्मदिन के दिन वो कर रहे है
जो मृत्यु का प्रतीक है.......
हमेशा दिया जलाने में और प्रकाश करने में
ख़ुशी मिलती है, अँधेरा करने में नहीं! लेकिन आज
ये कैसा दौर है कि लोग अँधेरा करने में खुश
हो रहे है... हमें ये
शोभा नहीं देता क्योंकि हम भारतीय संस्कृति के
संवाहक है और हमें चाहिए कि हम भी दीपक
कि तरह इस जगत को प्रकाशमान करें और
औरों के जीवन में भी प्रकाश लायें!
कृपया अँधेरा करने वाली इस परंपरा को बंद करें!
और दूसरों को भी प्रेरित करें!
जन्मदिन मनाने के और भी तरीके हैं जैसे हम
यज्ञ या हवन करें जिससे आस-पास का वातावरण
सुगन्धित और उर्जमायी हो जाये! या फिर हम
किसी मंदिर पर दीप-मालिकायें प्रजवलित कर
सकते है जो अपने आप में एक अनुपम ख़ुशी है और
पुरे वातावरण को रौशनी से भर देती है!
अपनी संस्कृति को पहचाने! जय हिन्द ..... जय
भारत
......धन्यवाद

अपने और परिवार के कोई भी सदस्य के
जन्मदिवस पर यझ (हवन) करके वैदिक
संस्कृति की ज्योत जलती रखे

विश्व की नज़र में श्रीमद्भागवद गीता

विश्व की नज़र में श्रीमद्भागवद गीता ----
***** अल्बर्ट आइन्स्टाइन- **
जब मैंने गीता
पढ़ी और विचार किया कि कैसे ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड कि रचना की है, तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ।

**** अल्बर्ट श्वाइत्जर - **
भागवतगीता का मानवता कि आत्मा पर गहन प्रभाव है, जो इसके कार्यों में झलकता है।

**** अल्ड्स हक्सले -****
भगवत गीता ने सम्रद्ध आध्यात्मिक विकास का सबसे सुवयाव्स्थित बयान दिया है। यह आज तक के सबसे शाश्वत दर्शन का सबसे स्पष्ट और बोधगम्य सार है, इसलिए इसका मूल्य केवल भारत के लिए नही, वरन संपूर्ण मानवता के लिए है।

***** हेनरी डी थोरो -***
हर सुबह मैं अपने ह्रदय और मस्तिष्क को भगवद गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और इसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।

***** हर्मन हेस -***
भगवत गीता का अनूठापन जीवन के विवेक की उस सचमुच सुंदर अभिव्यक्ति में है, जिससे दर्शन प्रस्फुटित होकर धर्म में बदल जाता है।

**** रौल्फ वाल्डो इमर्सन - **
मैं भागवत गीता का आभारी हूँ। मेरे लिए यह सभी पुस्तकों में प्रथम थी, जिसमे कुछ भी छोटा या अनुपयुक्त नहीं किंतु विशाल, शांत, सुसंगत, एक प्राचीन मेधा की आवाज जिसने एक - दूसरे युग और वातावरण में विचार किया था और इस प्रकार उन्हीं प्रश्नों को तय किया था, जो हमें उलझाते हैं।

*** थॉमस मर्टन-**
गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति, भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है।

**** डा. गेद्दीज़ मैकग्रेगर - **
पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रन्थ इतना अधिक उद्धरित नहीं होता जितना की भगवद गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय है

भिखारी

 
एक महान आश्चर्य : लोकल ट्रेन से उतरते
ही हमने (x)सिगरेट जलाने के लिए
एक साहब से माचिस
माँगी तभी किसी भिखारी ने
हमारी तरफ हाथ बढ़ाया
हमने कहा- "भीख माँगते शर्म नहीं आती?"

वो बोला-
"माचिस माँगते आपको आयी थी क्या" ??

बाबूजी! माँगना देश का करेक्टर है
जो जितनी सफाई से माँगे
उतना ही बड़ा एक्टर है
ये भिखारियों का देश है
लीजिए! भिखारियों की लिस्ट पेश है

धंधा माँगने वाला भिखारी
चंदा माँगने वाला
दाद माँगने वाला
औलाद माँगने वाला
दहेज माँगने वाला
नोट माँगने वाला
और तो और
वोट माँगने वाला

हमने काम माँगा
तो लोग कहते हैं चोर है

भीख माँगी तो कहते हैं
कामचोर है

उनसे कुछ नहीं कहते
जो एक वोट के लिए
दर-दर नाक रगड़ते हैं
घिस जाने पर रबर की ख़रीद लाते हैं
और उपदेशों की पोथियाँ खोलकर
महंत बन जाते हैं।

लोग तो एक बिल्ला से परेशान हैं
यहाँ सैकड़ों बिल्ले
खरगोश की खाल में
देश के हर कोने में विराजमान हैं।

हम भिखारी ही सही
मगर राजनीति समझते हैं
रही अख़बार पढ़ने की बात
तो अच्छे-अच्छे लोग
माँग कर पढ़ते हैं
समाचार तो समाचार
लोग-बाग पड़ोसी से
अचार तक माँग लाते हैं
रहा विचार!

तो वह बेचारा
महँगाई के मरघट में
मुर्दे की तरह दफ़न हो गयाहै।

समाजवाद का झंडा
हमारे लिए क़फ़न हो गया है
सत्य बहुत कड़वा होता है
कभी झोपड़ियों में झांककरदेखिए
लोग किस तरह जी रहे हैं
कूड़ा खा रहे हैं
और बदबू पी रहे हैं
उनका फोटो खींचकर
फिल्म वाले लाखों कमाते हैं
झोपड़ी की बात करते हैं
मगर जुहू में बँगला बनवाते हैं।

हमने कहा "फिल्म वालों से
तुम्हारा क्या झगड़ा है?"

वो बोला-
"आपके सामने भिखारी नहीं
भूतपूर्व प्रोड्यूसर खड़ाहै
बाप का बीस लाख फूँक कर
हाथ में कटोरा पकड़ा है!"

हमने पाँच रुपए उसके
हाथ में रखते हुए कहा-
"हम भी फिल्मों में ट्राई कर रहे हैं
भाई!"

वह बोला, "आपकी रक्षा करेंदुर्गा माई
आपके लिए दुआ करूँगा
लग गई तो ठीक
वरना आपके पाँच में अपने पाँच मिला कर
दस आपके हाथ पर धर दूँगा!

मुझे पूरा यक़ीन है पढने के बाद एक शेयर
तो बनता है....शेयर करोगे तो मुझे
लगेगा कि मेरी भावनाओँ का कद्र
किया है ।